Tuesday, June 26, 2007

काश मैं तेरे हसीन हाथ का कन्गन होता /वसी शाह


काश मैं तेरे हसीन हाथ का कन्गन होता

तू बड़े प्यार से बड़े चाओ से बड़े अरमान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को
और बेताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में
तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को
मैं तेरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता
जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती
तेरे होंठों की शिद्दत से मैं दहक सा जाता

रात को जब भी तू नीन्दों के सफ़र पर जाती
मर्मरी हाथ का इक तकिया बनाया करती
मैं तेरे कान से लग कर कई बातें करता
तेरी ज़ुल्फ़ों को तेरे गाल को चूमा करता
जब भी तू बन्द क़बा खोलने लगती जानाँ
अपनी आँखों को तेरे हुस्न से खेरा करता
मुझ को बेताब सा रखता तेरी चाहत का नशा
मैं तेरी रूह के गुलशन में महकता रहता
मैं तेरे जिस्म के आँगन में खनकता रहता
कुछ नहीं तो यही बेनाम सा बन्धन होता

काश मैं तेरे हसीन हाथ का कन्गन होता

2 Comments:

At 11:38 pm , Blogger Unknown said...

aapki ye kavita "khash me tere haseen hath ka kagan hota" mughe bhut achhi lagi ab mughe kavita nahi aati varna me is kavita ki tarif me khuch lafj bayan karti .par sach a nice..........

 
At 12:02 am , Blogger Gaurav Pratap said...

Madhu Ji, ye kavita meri nahi hai...ye ek Pakistani shayar Wasi Shah kii nazm hai..... aapako ye kavita achchhii lagi....... merii koshish safal huii.....

 

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