Monday, June 25, 2007

दयार-ए-ग़ैर में कैसे तुझे सदा देते \ वसी शाह


दयार-ए-ग़ैर में कैसे तुझे सदा देते
तू मिल भी जाता तो तुझे गँवा देते

[दयार-ए-ग़ैर=अनजान जगह; गँवा देना=खो देन]


तुम्हीं ने हम को सुनाया न अपना दुख वरना
दुआ वो करते के हम आसमान हिला देते


हमें ये ज़ोम रहा अब के वो पुकारेंगे
उन्हें ये ज़िद थी के हर बार हम सदा देते

[ज़ोम=छलावा]


वो तेरा ग़म था के तासीर मेरे लहजे की
के जिस को हाल सुनाते उसे रुला देते

[तासीर=प्रभाव; लहजा=तरीका]


तुम्हें भुलाना ही अव्वल तो दस्तारस में नहीं
जो इख़्तियार भी होता तो क्या भुला देते

[अव्वल=सबसे पहले; दस्तारस=पहुँच; इख़्तियार=नियंत्रण]


तुम्हारी याद ने कोई जवाब ही न दिया
मेरे ख़याल के आँसू रहे सदा देते


सम'तों को मैं ता-उम्र कोसता शायद
वो कुछ न कहते मगर होंठ तो हिला देते

[सम'तों=सुनने कि शक्ती; ता-उम्र=ज़िन्दगी भर]

2 Comments:

At 8:36 pm , Blogger Vikash said...

"तुम्हीं ने हम को सुनाया न अपना दुख वरना
दुआ वो करते के हम आसमान हिला देते "

वाह क्या शेर मारा है। :)

 
At 1:06 am , Blogger Unknown said...

hey gaurav,
good work....................

 

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