Wednesday, May 16, 2007

चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का \ फिराक गोरखपुरी


चांद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
रंग बदले किसी सूरत शब् -ए -तनहाई का

[जानिब = की ओर ; ज़ेबाई = खूबसूरती ; शब = रात ]

दौलत -ए -लब से फिर आई खुस्राव -ए -शिरीन - दहन
आज रिज़ा हो कोई हर्फ़ शाहान्शाई का

[लब = होठ ; खुसरवी = शाही ; शिरीन = मीठा / मीठी ; दहन = मुँह ]

दीदा -ओ -दिल को संभालो कि सर -ए -शाम "फिराक "
साज़ -ओ -सामान बहम पहुँचा है रुसवाई का

[दीदा -ओ -दिल = आंख और दिल ; बहम = साथ-साथ ]

4 Comments:

At 10:43 pm , Blogger परमजीत सिहँ बाली said...

प्रेषित रचना अच्छी है।बधाई।

 
At 12:18 am , Blogger Vikash said...

अति सुन्दर। उर्दू शायरी की मिठास देखनी हो तो 'फिराक'...:)

 
At 4:51 am , Blogger Udan Tashtari said...

वाह, फिराक साहब को यहाँ लाने के लिये बहुत साधुवाद.

 
At 7:20 am , Blogger Divine India said...

प्रस्तुत रचना का क्या कहना फिराक साहब के एक-2 शब्द ही स्वयं में परिपूर्ण होता है…।बधाई!!

 

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